ज से जंगल

🌿 अनुराग शुक्ला


ज से जंग ही नहीं ज से जंगल भी होता है। जंगल किसी जंग के मैदान से कम थोड़ी न है। अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद में यहां भी निरंतर जंग चलती है... अपने से, अपनों से...


बाहर से हरा भरा और घना, अंदर पोर पोर से रिसता दर्द। आपने जंगल की सिसकियां सुनी हैं। नहीं सुनी होंगी। कोई बात नहीं। कभी जंगल जाइएगा तो कान लगाइएगा। चारों तरफ पसरी शांति के बीच पक्षियों की चहचहाहट के साथ आपको धीमे से एक सिसकी सुनाई देगी। जरा नजर दौड़ाएंगे तो पेड़ों के ठूंठ भी सिसकते दिखेंगे। ये जंगल की सिसकी उसके अपने लिए नहीं है अपनों के लिए है। उन अपनों के लिए जिन्हें जीवंत रखने की उसपर जिम्मेदारी है।
सबको जीवन देने के फलसफे को जीते जंगल का अपना जीवन ही संकट में है। कभी सोचा है कि जब जंगल खत्म हो जाएंगे तो क्या होगा? ज्यादातर जगहों से जंगल नष्ट हो रहे हैं तो वहां क्या हो रहा है? इंसान के लालच का कैसा प्रभाव पड़ रहा? इससे हमपर भी कोई संकट आएगा? इन सवालों का जवाब हमें ही ढूंढना है। यूं कहें कि ढूंढना ही पड़ेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि हम भी जंगल के अपनों में हैं... याद है न जंगल की सिसकी...

आंकड़ों की बात
वैसे तो आंकड़ों में मुझे खास दिलचस्पी नहीं होती लेकिन विश्वसनियता के लिए कई बार जरूरी लगते हैं। वनों की बात करें तो अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) के अनुसार 30.7 प्रतिशत पृथ्वी की सतह जंगलों से ढंकी है। वर्तमान में 13 मिलियन हेक्टेयर वन हर साल नष्ट हो रहे हैं। ऐसे में वनों के साथ ही ये अनमोल जैव विविधता भी नष्ट हो रही है।इतना ही नहीं पृथ्वी करीब आठ मिलियन प्रजातियों का घर है। इनमें से 80 प्रतिशत जैव विविधता जंगल में रहती है। अनुमानत: एक मिलियन प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।



Comments

  1. जड़‌,जंगल ,प्रकृति के‌ साथ अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया है आपने इस‌blog मे‌ं ।आपसे‌प्रेरणा पाकर मुझे भी लेखन मे‌रुचि बढ़ने‌‌लगी।सर‌

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    1. धन्यवाद। जो भी लिख सकें अवश्य लिखें।

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