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हम जीवों के लिए उपयुक्त माहौल बनाएं, जीव हमारे लिए स्वस्थ पर्यावरण बनाएंगे

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अनुराग शुक्ला 🐯🌳💮🐞🌲🎄 22 मई को #अंतरराष्ट्रीय_जैव_विविधता_दिवस है। साल 2024 की थीम है ‘योजना का हिस्सा बनें’। हम जरा सा ध्यान दें तो पाएंगे कि हमारे आसपास जैव विविधता की विस्तृ़त शृंखला मौजूद है। जैव विविधता में नन्हीं कीट से लेकर विशाल पशु-पक्षी तक, घास से लेकर आसमान छूते पेड़ों तक और जमीन पर रेंगने वाले जीवों से लेकर सागर की अनंत गहराइयों तक में गोते लगाने वाले जीव हैं। इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि सूक्ष्म से लेकर विशाल तक जो भी जीवित है सबकुछ इसके अंतर्गत आता है। हाल के वर्षों में जैव विविधता को बहुत ज्यादा और तेजी से नुकसान हुआ है। कुछ जीवों को खत्म होते हम देख रहे हैं जबकि कई ऐसे हैं जिनके दिखने न दिखने का हमें पता तक नहीं चलता। परंतु वे सभी हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसे ऐसे समझें कि नन्हीं मधुमक्खी को सामान्यत: हम शहद के लिए ही जानते हैं परंतु शहद उत्पादन उसका एक दिखने वाला कार्य है। प्रकृति उस नन्हीं जीव की सहायता से अन्न, फल, फूल आदि के उत्पादन के लिए परागण जैसी अति आवश्यक प्रक्रिया को पूर्ण करवाती है ताकि हमसभी का पेट भर सके। यदि मधुमक्खियां या उसके जैस...

दुनिया से खत्म हो गईं पेड़-पौधों की 800 प्रजातियां

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अनुराग शुक्ला 🌳🌴🌲🎄 पेड़ों की क्या आवश्यकता है, पेड़ कितने महत्वपूर्ण हैं, पेड़ों के खत्म होने से क्या फर्क पड़ रहा है, क्या हमें पता है कि दुनिया में कितने पेड़-पौधे हैं... कुछ ऐसे ही सवाल कई बार पूछे जाते हैं। मानवों की निर्भरता पेड़ों पर बहुत अधिक है। ये हमारे जीवन के लिए आवश्यक ऑक्सीजन, हवा को साफ करने, खतरनाक कार्बन के अवशोषण, पानी को स्वच्छ करने और लकड़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। हाल ही में किए गए वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार पृथ्वी पर करीब 73,000 पेड़ों की प्रजातियां हैं। इनमें से लगभग 9,200 प्रजातियां अभी भी खोजी जानी हैं। हालांकि दावा यह है कि यह संख्या कई गुना अधिक हो सकती है। ‘नेचर’ जर्नल में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में अभी 30 खरब 40 अरब पेड़ हैं। पूरी दुनिया में हर साल 15 अरब पेड़ काटे जा रहे हैं। यह आंकड़ा विश्व की कुल आबादी आठ अरब के दोगुने के आसपास है। इन अध्ययनों के साथ ही अब एक नया अध्ययन सामने आया है। इंग्लैंड के रॉयल बॉटेनिक गार्डेन्स के वैज्ञानिकों का दावा है कि 18वीं सदी से अब तक दुनिया से पेड़-पौधों की 800 प्रजातियां खत्म हो चुकी हैं। इतना ही नह...

मियावाकी वन एक उम्मीद...

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अनुराग शुक्ला 🌳🌴🌲 गुजरात के क्योलड़िया में मियावाकी वन का उद्घाटन करने के बाद भ्रमण करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साथ में मुख्यमंत्री। फोटो : एजेंसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के केवड़िया में #मियावाकी वन का शुभारंभ किया। मियावाकी वन जापानी पद्धति है और भारत के लिए नया प्रयोग। कम क्षेत्र में फैला ये जंगल पारिस्थितिकि तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और जैवविविधता को समृद्ध करता है। मियावाकी जंगल #ऑक्सीजन बैंक की तरह काम करते हुए बारिश को भी आकर्षित करता है। यह पद्धति जापानी वनस्पतिशास्त्री और पारिस्थितिकी विज्ञानी डॉ. अकीरा मियावाकी ने विकसित की है और उन्हीं के नाम पर इसका नाम मियावाकी पड़ा है।                                                                                            ...

अब बेहद कम दिखते हैं मच्छरों के जानी दुश्मन मेंढक 🐸

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 अनुराग शुक्ला मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया जैसी मच्छर जनित बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। हर वर्ष इन बीमारियों से हजारों लोगों की मौत हो जाती है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से मच्छरों के खात्मे के लिए हर वर्ष अभियान चलाए जाते हैं। तमाम रासायनिक छिड़काव किए जाते हैं। हम घरों में क्वायल से लेकर शरीर पर लगाने वाले क्रीम के प्रयोग समेत तमाम उपाय करते हैं लेकिन दो चार दिनों की राहत के बाद मच्छर दोबारा लौटते हैं और आक्रामक होकर हमे परेशान करते हैं। मच्छरों को लेकर साफ-सफाई के लिए स्कूलों से लेकर सामाजिक संगठन जागरूकता अभियान चलाते हैं लेकिन इन सब कवायद के बाद भी न तो मच्छर कम हो रहे हैं और न ही मच्छर जनित बीमारियों का असर। आपने कभी सोचा है कि इतने उपयों के बाद भी आखिर मच्छरों की संख्या कम क्यों नहीं होती। दरअसल हम मच्छरों को खत्म करने के लिए जो रासायनिक उपाय अपना रहे हैं वे प्रभावी होने की जगह और नुकसानदायक हैं। उनसे मच्छरों की संख्या पर तो लगाम नहीं लगती उल्टा उनके प्राकृतिक दुश्मन तेजी से नष्ट हो रहे हैं।                  ...

उम्मीदों का पेड़

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- अनुराग शुक्ला केन्या की सबाकी नदी में तन कर खड़ा मैंग्रोव एक पेड़ न सिर्फ इंसानी बर्बरता की कहानी बयां कर रहा है बल्कि हरियाली एक उम्मीद भी बन गया है। कभी इस साफ सुथरी नदी के किनारों पर मैंग्रोव का बड़ा जंगल था, जहां समृद्ध जैविविधता थी लेकिन लोगों ने अपने पारंपरिक घर बनाने के लिए लकड़ी काटकर पूरे जंगल को नष्ट कर दिया। बच गया तो बस यही एक पेड़। जो इंसान की कुल्हाड़ियों के आगे डटा रहा। आज अकेला बचा यह पेड़ स्थानीय स्वाहिली लोगों को फिर से मैंग्रोव के जंगल बसाने के लिए प्रेरित कर रहा है। DW.com ने स्थानीय लोगों के हवाले से बताया कि यहां अब तेजी से मैंग्रोव के पौधे बड़े हो रहे हैं। लोग इसका संरक्षण भी कर रहे हैं। मैंग्रोव का जंगल हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद आवश्यक है। यह सामान्य पेड़ों के सापेक्ष पांच गुना अधिक कार्बन सोखकर वापस जमीन में लौटा देता है। इसके साथ ही मैंग्रोव के पेड़ समुद्री तूफानों और लहरों से तटों की रक्षा करते हैं। मिट्टी का कटाव भी रोकते हैं। भारत में सुंदर वन का मैंग्राव जंगल भी तेजी से नष्ट हो रहा है। इसके चलते बंगाल टाइगर का यह प्राकृतिक आवास खतरे में है। ...

मोनार्क तितली 🦋 अब तस्वीरों में ही मिलेंगी!

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- अनुराग शुक्ला 🦋                                                                                                                                                                             फोटो साभार : इंटरनेट अमेरिका में पाई जाने वाली खूबसूरत मोनार्क तितली विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है। इसे पहली बार आईसीयूएन (इंटरनेशनल यूनियन ऑफ कंजर्वेशन ऑफ नेचर) द्वारा जारी रेड लिस्ट में संकटग्रस्त प्रजातियों को सूची में शामिल किया गया है। ऐसा तब किया जाता है जब पूरी की पूरी प्रजाति के अ...

अन्नदाता ! नन्ही मधुमक्खी

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 - अनुराग शुक्ला हमारी खूबसूरत पृथ्वी असंख्य जीवों का घर है। इसका अस्तित्व बचाए रखने में तितलियों, पतंगों, भृंग, मधुमखियों, ततैया सहित 29 प्रमुख कीट समूहों की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका है। ये नन्हे जीव धरती की जैवविविधता को तो समृद्ध करते ही हैं, दुनिया की 87 प्रमुख खाद्य फसलों से मिलने वाले फल, सब्जियां और बीज के परागण की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। आज बात करेंगे इन्हीं कीटों में से एक मधुमक्खी की।  धरती पर मधुमक्खियों की 20 हजार से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। ये 2 मिलीमीटर से लेकर 4 सेंटीमीटर तक के आकार में होती हैं। फूल-पौधे और मधुमक्खियों के बीच महत्वपूर्ण संबंध है। ये सिलसिला करीब 10 करोड़ वर्ष से चल रहा है। ऐसे में दोनों के बीच सामंजस्य और परस्पर निर्भरता पृथ्वी को लगातार समृद्ध कर रही है। दरअसल हम जितने भी प्रकार की खाद्य फसलें प्रयोग करते हैं उनमें से करीब 75% बीज और फल होते हैं। प्रमुख खाद्य फसलों का उत्पादन पूर्ण या आंशिक रूप से परागण पर ही निर्भर है। परागण की इस प्रक्रिया में मधुमक्खियों का योगदान अग्रणी है।  फूल पर बैठी मधुमक्खी सिर्फ शहद के लिए रस ही नहीं जुटाती...