मियावाकी वन एक उम्मीद...

अनुराग शुक्ला 🌳🌴🌲


गुजरात के क्योलड़िया में मियावाकी वन का उद्घाटन करने के बाद भ्रमण करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साथ में मुख्यमंत्री। फोटो : एजेंसी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के केवड़िया में #मियावाकी वन का शुभारंभ किया। मियावाकी वन जापानी पद्धति है और भारत के लिए नया प्रयोग। कम क्षेत्र में फैला ये जंगल पारिस्थितिकि तंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और जैवविविधता को समृद्ध करता है। मियावाकी जंगल #ऑक्सीजन बैंक की तरह काम करते हुए बारिश को भी आकर्षित करता है। यह पद्धति जापानी वनस्पतिशास्त्री और पारिस्थितिकी विज्ञानी डॉ. अकीरा मियावाकी ने विकसित की है और उन्हीं के नाम पर इसका नाम मियावाकी पड़ा है।

                                                                                                                                           फोटो : गूगल       
आप सोच रहे होंगे कि तमाम जंगल हैं ऐसे में जापानी तकनीक मियावाकी की बात क्यों हो रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह जंगल सामान्य जंगलों से बिल्कुल अलग है। दरअसल मियावाकी वन में आम वनों से दस गुना तेजी से पेड़ बढ़ते हैं और यह 30 गुना अधिक सघन होने के साथ ही दो से तीन वर्ष में तैयार हो जाते हैं, जबकि पारंपरिक वनों को विकसित होने में 20 से 30 वर्ष तक लग जाते हैं। साइंस जर्नल में छपे एक शोध से मियावाकी तकनीक की आवश्यकता के बारे में विस्तार से बताया गया है। शोधार्थियों के अनुसार तेजी से गर्म होती दुनिया को ठंडा रखने में #जंगल की महत्वपूर्ण भूमिका है और जंगल ही तेजी से खत्म हो रहे हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन जैसे खतरे से निपटने के लिए पृथिवी पर एक लाख करोड़ पेड़ लगाए जाने चाहिए। इसके लिए तेजी से बढ़ने वाले पेड़ और जंगल की तकनीक चाहिए जो मियावाकी से संभव दिखता है। यही कारण है कि न सिर्फ #जापान बल्कि दुनिया के कई अन्य देशों में भी इस पद्धति से जंगल उगाने की उत्सुकता दिख रही है। भारत में गुजरात, भोपाल के अलावा कई अन्य शहरों में यह नाम अब लोकप्रिय हो रहा है।


                                                                                                                                            फोटो : गूगल   

इस पद्धति में विभिन्न प्रजातियों के पौधे एक-दूसरे के करीब लगाए जाते हैं। इनमें न सिर्फ मनमोहक फूलों वाले पौधे होते हैं बल्कि फलों, औषधियों, इमारती लकड़ी वाले पेड़ के साथ ही मिश्रित प्रजातियों वाले पेड़-पौधे लगाए जाते हैं। इसे ऐसा समझें कि झाड़ीनुमा, मध्यम आकार के पेड़ और छांव देने वाले बड़े पेड़ सब एक निश्चित दूरी पर मिश्रित तरीके से लगाए जाते हैं। इसके लिए सबसे पहले मिट्टी की जांच, मिट्टी के अनुकूल पेड़-पौधों की पहचान कर तीन फीट गहरे गड्ढे में उनके बीज रोपे जाते हैं। मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए उसमें चावल की भूसी, गोबर, जैविक खाद या नारियल के छिलके आदि डाल दिए जाते हैं। पौधे होने पर उन्हें मियावाकी के लिए तय जगह पर रोपकर दो से तीन साल तक देखभाल करें। उसके बाद ये पौधे खुद बढ़ने के लिए सक्षम हो जाते हैं। इस पद्धति से बंजर जमीन, शहरों के पार्क या बेकार पड़े भूभाग, धार्मिक स्थलों के आसपास के खाली स्थानों पर जंगल विकसित किए जा सकते हैं।

                                                                                                                                      फोटो : गूगल  

 
अच्छी बात ये है कि भारत में भी लोग अब जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को समझ रहे हैं। सरकार, कई सामाजिक संगठन और व्यक्तिगत स्तर पर भी लोग पौधरोपण के लिए प्रयासरत हैं। छोटे जंगल और मियावाकी पद्धति को लेकर भी जागरूकता आई है। स्वस्थ पर्यावारण के लिए प्रयास करना किसी अकेले की नहीं बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है। आगे आएं, जो भी बन पड़े अपने पर्यावरण की बेहतरी के लिए उपक्रम करें। हम आज जो करेंगे उसी पर मानव जाति और हमारी खूबसूरत पृथिवी का जीवन निर्भर है। उम्मीद है कि हम मियावाकी जैसी तकनीकों को अपनाकर आने वाली पीढ़ियों को एक बेहतर कल दे पाएंगे।

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