उम्मीदों का पेड़
- अनुराग शुक्ला
केन्या की सबाकी नदी में तन कर खड़ा मैंग्रोव एक पेड़ न सिर्फ इंसानी बर्बरता की कहानी बयां कर रहा है बल्कि हरियाली एक उम्मीद भी बन गया है। कभी इस साफ सुथरी नदी के किनारों पर मैंग्रोव का बड़ा जंगल था, जहां समृद्ध जैविविधता थी लेकिन लोगों ने अपने पारंपरिक घर बनाने के लिए लकड़ी काटकर पूरे जंगल को नष्ट कर दिया। बच गया तो बस यही एक पेड़। जो इंसान की कुल्हाड़ियों के आगे डटा रहा। आज अकेला बचा यह पेड़ स्थानीय स्वाहिली लोगों को फिर से मैंग्रोव के जंगल बसाने के लिए प्रेरित कर रहा है। DW.com ने स्थानीय लोगों के हवाले से बताया कि यहां अब तेजी से मैंग्रोव के पौधे बड़े हो रहे हैं। लोग इसका संरक्षण भी कर रहे हैं।
मैंग्रोव का जंगल हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद आवश्यक है। यह सामान्य पेड़ों के सापेक्ष पांच गुना अधिक कार्बन सोखकर वापस जमीन में लौटा देता है। इसके साथ ही मैंग्रोव के पेड़ समुद्री तूफानों और लहरों से तटों की रक्षा करते हैं। मिट्टी का कटाव भी रोकते हैं।
भारत में सुंदर वन का मैंग्राव जंगल भी तेजी से नष्ट हो रहा है। इसके चलते बंगाल टाइगर का यह प्राकृतिक आवास खतरे में है। जरूरत है यहां भी केन्या के स्वाहिली लोगों से सबक लेने का ताकि मैंग्रोव के जंगल के रूप में अनमोल संपदा नष्ट न हो।
(लेख में प्रयोग की गई जानकारियां DW.com से ली गई हैं।)

सुंदर
ReplyDeleteधन्यवाद
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