अब बेहद कम दिखते हैं मच्छरों के जानी दुश्मन मेंढक 🐸

 अनुराग शुक्ला


मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया जैसी मच्छर जनित बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। हर वर्ष इन बीमारियों से हजारों लोगों की मौत हो जाती है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से मच्छरों के खात्मे के लिए हर वर्ष अभियान चलाए जाते हैं। तमाम रासायनिक छिड़काव किए जाते हैं। हम घरों में क्वायल से लेकर शरीर पर लगाने वाले क्रीम के प्रयोग समेत तमाम उपाय करते हैं लेकिन दो चार दिनों की राहत के बाद मच्छर दोबारा लौटते हैं और आक्रामक होकर हमे परेशान करते हैं। मच्छरों को लेकर साफ-सफाई के लिए स्कूलों से लेकर सामाजिक संगठन जागरूकता अभियान चलाते हैं लेकिन इन सब कवायद के बाद भी न तो मच्छर कम हो रहे हैं और न ही मच्छर जनित बीमारियों का असर। आपने कभी सोचा है कि इतने उपयों के बाद भी आखिर मच्छरों की संख्या कम क्यों नहीं होती। दरअसल हम मच्छरों को खत्म करने के लिए जो रासायनिक उपाय अपना रहे हैं वे प्रभावी होने की जगह और नुकसानदायक हैं। उनसे मच्छरों की संख्या पर तो लगाम नहीं लगती उल्टा उनके प्राकृतिक दुश्मन तेजी से नष्ट हो रहे हैं।  


                                                                                                                                    चित्र साभार pngtree

मच्छर का सबसे बड़ा दुश्मन मेंढक है जो तेजी से विलुप्त हो रहा है। पहले बारिश शुरू होते ही मेंढकों की टर्र-टर्र से वातावरण गूंज जाता था। क्योंकि वह समय उनके मिलन का होता है। उसके बाद के दिनों में तेजी से मेंढकों की संख्या बढ़ती है। मेंढक अपनी भूख मिटाने के लिए मच्छर, उनके लार्वा और अन्य कीट-पतंगों को चट कर जाते हैं। याद करिए आखिरी बार आप ने अपनी गली या रास्ते पर मेंढक कब देखे थे? शायद वर्षों पहले। अमेरिकन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के मुताबिक 2015 में मेंढक और टोड की 6482 प्रजातियां मौजूद थीं। विशेषज्ञों की माने तो हाल के दिनों में दलदली भूमि में रहने वाले जलचर और थलचर जीवों की संख्या में 30 प्रतिशत की गिरावट आई है। ये गिरावट लगातार जारी है। 

मौसम में बदलाव आने से गर्म दिन बढ़ रहे हैं। ताल, तलैया, आर्द्रभूमि तेजी से सूख रहे हैं। इसका भी दुष्प्रभाव पड़ रहा है। पानी वाली जगहों पर पेड़, पौधे और झाड़ियां होती हैं। ये स्थान मेंढकों के लिए अनुकूल होते हैं, जो पानी वाले जगह सिकुड़ने से कम हो रहे हैं। मेंढ़कों के अंडों पर कोई मजबूत सुरक्षा आवरण नहीं होता। ऐसे में वे सूरज की तेज रोशनी सहन नहीं कर पाते और नष्ट हो जाते हैं। 

एक अन्य कारण भी बड़े प्रभावी तरीके से अपना असर डाल रहा है और वो है कृषि व अन्य क्षेत्रों में कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग। कीटनाशकों से न सिर्फ मेंढकों को नुकसान पहुंचाता है बल्कि अन्य जीव भी तेजी से खत्म हो रहे हैं। मेंढक उभयचर प्राणी होता है। यानि कि जल और थल दोनों जगह रह लेता है। मेंढक अपनी त्वचा से ही पानी पीता है। ये बेहद संवेदनशील होती है, जिसके कारण प्रदूषण और रासायनों का दुष्प्रभाव अधिक पड़ता है। क्योंकि मेंढकों की त्वचा बाहरी पदार्थों को सोख लेती है। ऐसे में खेतों, नालियों में डाले जाने वाले केमिकल इनकी त्वचा के जरिए ज्यादा मात्रा में शरीर में पहुंचकर इन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। यही कारण है कि मेंढक ग्रामीण क्षेत्रों में भी तेजी से कम हो रहे हैं। वहीं शहरों में हमने जगह ही नहीं छोड़ी है। घर के बाहर जरा सी जमीन दिखी नहीं कि कीचड़-गंदगी से बचने और सुंदरता बढ़ाने के लिए उसपर सीमेंट की परत चढ़ा देते हैं। इसका नतीजा ये होता है कि मेंढक जैसे न जाने कितने जीवों का घर छिन जाता है। जिसपर हमारी नजर नहीं जाती। 

अब जब मच्छरों को खाने वाले जीव विलुप्त होने लगेंगे तो नुकसान झेलना पड़ेगा ही। तेजी से मच्छरों की आबादी बढ़ेगी और उन्हें खत्म करने के लिए हम और कीटनाशक प्रयोग करेंगे... नतीजा मच्छरों की आबादी नियंत्रित करने वाले मेंढक जैसे जीव मरेंगे और मच्छरजनित बीमारियां विकराल रूप लेती जाएंगी। 


तो अगली बार मेंढक महाशय दिखें तो उन्हें धन्यवाद कहिएगा और उनके जीवन की रक्षा के लिए प्रार्थना भी करिएगा। 


Comments

Popular posts from this blog

हम जीवों के लिए उपयुक्त माहौल बनाएं, जीव हमारे लिए स्वस्थ पर्यावरण बनाएंगे

शर्मीली बाघिन जिसने बरेली की बंद फैक्ट्री पर किया राज

पर्यावरण प्रहरी : पेड़ बचाने को घर का नक्शा बदल डाला