जंगल में मानव दखल से बाघ बेचैन
🐾अनुराग शुक्ला
अपनी प्रजाति का सबसे ताकतवर जीव बाघ संकटग्रस्त है। अंधाधुंध शिकार और मानवों से संघर्ष के कारण इसपर खतरा बढ़ा है। आइए जानते हैं कि क्यों बाघों के सरंक्षण की जरूरत है।
पूरी दुनिया में अनुमानित 3,900 बाघ जंगल में रहते हैं। इनमें से सार्वाधिक अपने देश में हैं। वर्ष 2018-19 की गणना के आधार पर भारत में करीब तीन हजार (2967) बाघ हैं। 526 बाघों के साथ मध्यप्रदेश देश का सार्वाधिक बाघों वाला प्रदेश है। वहीं दूसरे नंबर पर रहे कर्नाटक में 524 और तीसरे नंबर पर रहे उत्तराखंड में 442 बाघ हैं। उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां लखीमपुर खीरी टाइगर रिजर्व में 100 से ज्यादा, जबकि पीलीभीत टाइगर रिजर्व में 65 से अधिक बाघ हैं। भारतीय जंगलों में अनुकूल पर्यावरण मिलने पर बाघों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन इसके साथ ही जंगल में मानवों के बढ़ते दखल ने बाघों को बेचैन कर दिया है। विशेषज्ञों की मानें तो तमाम उपायों के बाद भी शिकारियों और ग्रामीणों की पहुंच जंगल के कोर जोन तक हो जाने से इन वन्य जीवों के रहन-सहन में खलल पड़ रहा है। इसके अलावा जंगल से सटे इलाकों में गन्ने की खेती होती है। बड़े घास विडालवंशियों के छिपने के लिए मुफीद होते हैं। उत्तर प्रदेश में हिमालय का तराई क्षेत्र लखीमपुर खीरी और पीलीभीत इलाका गन्ने की खेती के लिए जाना जाता है। गन्ने की ऊंचाई और सघनता घास जैसी होने के कारण बाघों के छिपने के लिए अनुकूल हो जाते हैं। बाघ इन्हें हाईवे की तरह उपयोग करते हुए मानव बस्तियों तक पहुंच जाते हैं। पीलीभीत और लखीमपुर के दुधवा इलाके में बाघ और मानवों के टकराव की घटनाएं भी लगातार सामने आ रही हैं।
इसलिए जरूरी है जंगल में बाघ का होना
प्रकृति ने सभी जीवों को विशेष गुण दिए हैं। जंगल में संतुलन बनाए रखने में बाघों का बहुत बड़ा योगदान है। तृणभोजी जीव (हिरन, चीतल, सांभर, अंपाला, नीलगाय आदि) बाघों के प्राकृतिक आहार हैं। तृणभोजियों की संख्या बढ़ने पर जंगल की हरियाली को क्षति पहुंचती है। ऐसे में प्रकृति प्रदत्त स्वभाव के कारण बाघ तृणभोजियों का शिकार करता है। इसके साथ ही जहां बाघ रहते हैं वहां उनकी दहशत के कारण इंसानी दखल भी सामान्यत: कम होता है। इसतरह से जंगल का संतुलन बनाए रखने में बाघ महत्वपूर्ण साबित होता है। हालांकि इनदिनों जंगल में इंसानों की घुसपैठ बढ़ने से बाघ ज्यादा आक्रामक हो रहे हैं।
तेजी, ताकत और चपलता बाघ को बनाती है विशेष
आकार-प्रकार : बाघ की औसत उम्र 20 से 30 वर्ष होती है। ये अपना इलाका बनाकर अकेले रहना पसंद करते हैं। अपने इलाके की सीमाओं पर मूत्र कर निशान लगाते हैं। करीब साढ़े तीन महीने के गर्भकाल के बाद बाघिन दो से तीन शावक को जन्म देती है। बाघ की 8 प्रजातियो में से अब सिर्फ 6 ही बची हैं। बड़े आकार, ताकत के साथ ही काली धारियों से पहचाना जा सकता है। बाघ की सुनने, सूंघने और देखने की क्षमता तेज होती है। करीब 19 वर्ष बाघ की आयु होती है।
आवास : बाघ को वन, दलदली क्षेत्र व घास के मैदानों के पास रहना पसंद है। अंधेरे में साफ शिकार देखने की क्षमता के कारण इसे बाघ को रात में शिकार पसंद है।
आहार : देखने में सुंदर इस खतरनाक जानवार को हिरण, गाय, भैंस, बकरी, चीतल पसंद हैं। एक बार में 25 किलो मांस खा सकता है। अब जंगल के अंदर तक फैलती इनसानी बस्तियों के कारण पालतू पशुओं को भी निशाना बना रहा है।
हमले का तरीका: बाघा झाड़ियों व ऊंची घास के बीच अच्छी तरह छिप जाता है। ज्यादातर बार शिकार उसे देख नहीं पाता। बाघ अक्सर पीछे से हमला करता है। दबेपांव छिपकर शिकार के नजदीक तक पहुंच अचानक से कूद पड़ता है। इसे तैरने में भी महारत हासिल है।
कमजोरी : बाघ का शरीर भारी होता है ऐसे में वह शिकार का पीछा करते समय जल्द थक जाता है। इसलिए वह लंबी दूरी तक नहीं दौड़ पता और मजबूरन शिकार छोड़ देता है। विशेषज्ञों के अनुसार हर 20 प्रयासों में वह एक बार ही सफल हो पाता है।
बाघों के शिकार का कारण
बाघ के अंगों का दवाओं और लक्जरी उत्पादों में प्रयोग हो रहा है। इनकी मांग बहुत ज्यादा होने से अंधाधुंध शिकार किया जा रहा है, जिससे इनके विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।
दांत : करीब तीन इंच तक लंबे चार दांत मांस को चीरने का काम करते हैं। कुछ छोटे दांत भी होते हैं। आभूषण व ताबीज के रूप में प्रयोग होते हैं। वहीं हड्डियों से शक्तिवर्धक दवाएं बनाए जाते हैं।
नाखून : करीब तीन इंच तक के नाखून पैर में एक खास आवरण से ढंके होते हैं। शिकार दबोचने के समय ये नाखून खंजर की तरह बाहर निकल आते हैं। नाखून जेवर और ताबीज के रूप में प्रयोग।
खाल : बाघ की खाल भूरे रंग और काली पट्टियों के कारण बहुत पसंद किया जाता है। बाघ के खाल से कपड़ा, कालीन और सजावटी सामान बनाए जाते हैं।
बाघ संरक्षण के लिए बनाए गए रिजर्व
लगातार होते शिकार ने बाघों को विलुप्त होने की कगार पर ला दिया है। भारत में बाघों के सरंक्षण के लिए सरकार ने पहल करते हुए वर्ष 1973 में बाघ अभ्यारण की स्थापना की। शुरुआत में 9 टाइगर रिजर्व बनाए गए जो अब 50 हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश में दुधवा टाइगर रिजर्व और पीलीभीत टाइगर रिजर्व बनाए गए। पीलीभीत टाइगर रिजर्व 73000 हेक्टेयर में फैला है। साल का विशाल घना सुंदर जंगल वन्य जीवन से भरपूर इस जंगल के अंदर से कई नदियां व नहरें गुजरती हैं। बाघ संरक्षण के नाम पर जंगल नौ जून 2014 को टाइगर रिजर्व का दर्जा दिया गया। वहीं प्रदेश का इकलौता नेशनल पार्क दुधवा 1324 वर्ग किलोमीटर एरिया में फैला है। बफर जोन और यहां के जंगल बाघों के लिए मुफीद हैं। यह किशनपुर सेंचुरी में इस सत्र में सबसे ज्यादा बाघ दिखे पर बाघ जंगल में हों तो बेहतर है, अब वे गांवों के करीब भी दिख रहे हैं।
आधुनिक तकनीकों और संसाधनों को अपना कर बचा सकते हैं बाघों की जान
सेंटर फार वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन एंड डिजीज सर्विलेंस के प्रधान वैज्ञानकि डॉ. अभिजीत पावड़े का कहना है कि लखीमपुर के दुधवा टाइगर रिजर्व और पीलीभीत टाइगर रिजर्व का पूरा इलाका बाघों और अन्य वन्यजीवों के लिए मुफीद है। दोनों जगह की आबोहवा जंगली जानवरों के अनुकूल होने से उनके रहने के लिए अच्छा माहौल है। इसके कारण वन्य जीवों की संख्या में इजाफा हो रहा है लेकिन इनसब के साथ ही इन जानवरों की सुरक्षा और आहार का संकट भी खड़ा हो रहा है। टाइगर रिजर्व में मौजूद संसाधन वर्तमान के अनुकूल नहीं हैं। यहां पर बाघों पर नजर रखने के लिए न तो पर्याप्त मचान हैं न ही जीपीएस तकनीक बेहतर है। इसके अलावा रिमोट सेंसिंग तकनीक भी नहीं है जिससे बाघ की लोकेशन को ट्रेस करना आसान हो। ऐसे में वन्य जीवों के सरंक्षण के लिए हमें इन संसाधनों को बढ़ाने के साथ ही आधुनिक तकनीकों का भी उपयोग करना पड़ेगा। यदि इसको लेकर कदम नहीं उठाए गए तो बाघों के साथ ही अन्य जीवों के संरक्षण में भी दिक्कतें आएंगी।
इन बेरहम तरीकों से बाघों का हो रहा शिकार
बाघों के शिकार के लिए शिकारी बेहद कू्रर तरीकों का प्रयोग करते हैं। बाघों के आनेजाने के रास्ते पर लोहे के मजबूत फंदे लगाकर छोड़ दिया जाता है। जब बाघ उधर से गुजरता है तो उनका पैर लोहे के ट्रैप में फंस जाता है। नजीता बाघ तड़प-तड़प कर खुद मर जाता है या शिकारी आसानी से मार देते हैं। इसके अलावा लोहे के तार का ट्रैप भी बांध दिया जाता है। कई स्थानों पर गड्ढे बनाकर उसके ऊपर बांस की फट्टी लगाकर उसे पत्तियों से ढ़क दिया जाता है। बाघ को वह गड्ढा आम रास्ता समझ में आता है। उधर से गुजरने के दौरान वह गड्ढे में गिर जाता है। बाद में शिकारी आसानी से उन्हें मार डालते हैं। वहीं आजकल पेस्टीसाइड के प्रयोग से भी बाघ को मौत की नींद सुलाया जा रहा है। पालतू पशुओं के शरीर में घाव कर उसमें जानलेवा पेस्टीसाइड डालकर उसे जंगल में छोड़ दिया जा रहा है। नतीजा बाघ, तेंदुए या अन्य जंगली जानवर इन पशुओं का शिकार कर लेते हैं। कुछ ही दिन में पेस्टीसाइड के कारण उनकी मौत हो जाती है।
अपनी प्रजाति का सबसे ताकतवर जीव बाघ संकटग्रस्त है। अंधाधुंध शिकार और मानवों से संघर्ष के कारण इसपर खतरा बढ़ा है। आइए जानते हैं कि क्यों बाघों के सरंक्षण की जरूरत है।
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| फोटो : बिलाल रजा, पीलीभीत |
पूरी दुनिया में अनुमानित 3,900 बाघ जंगल में रहते हैं। इनमें से सार्वाधिक अपने देश में हैं। वर्ष 2018-19 की गणना के आधार पर भारत में करीब तीन हजार (2967) बाघ हैं। 526 बाघों के साथ मध्यप्रदेश देश का सार्वाधिक बाघों वाला प्रदेश है। वहीं दूसरे नंबर पर रहे कर्नाटक में 524 और तीसरे नंबर पर रहे उत्तराखंड में 442 बाघ हैं। उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां लखीमपुर खीरी टाइगर रिजर्व में 100 से ज्यादा, जबकि पीलीभीत टाइगर रिजर्व में 65 से अधिक बाघ हैं। भारतीय जंगलों में अनुकूल पर्यावरण मिलने पर बाघों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन इसके साथ ही जंगल में मानवों के बढ़ते दखल ने बाघों को बेचैन कर दिया है। विशेषज्ञों की मानें तो तमाम उपायों के बाद भी शिकारियों और ग्रामीणों की पहुंच जंगल के कोर जोन तक हो जाने से इन वन्य जीवों के रहन-सहन में खलल पड़ रहा है। इसके अलावा जंगल से सटे इलाकों में गन्ने की खेती होती है। बड़े घास विडालवंशियों के छिपने के लिए मुफीद होते हैं। उत्तर प्रदेश में हिमालय का तराई क्षेत्र लखीमपुर खीरी और पीलीभीत इलाका गन्ने की खेती के लिए जाना जाता है। गन्ने की ऊंचाई और सघनता घास जैसी होने के कारण बाघों के छिपने के लिए अनुकूल हो जाते हैं। बाघ इन्हें हाईवे की तरह उपयोग करते हुए मानव बस्तियों तक पहुंच जाते हैं। पीलीभीत और लखीमपुर के दुधवा इलाके में बाघ और मानवों के टकराव की घटनाएं भी लगातार सामने आ रही हैं।
इसलिए जरूरी है जंगल में बाघ का होना
प्रकृति ने सभी जीवों को विशेष गुण दिए हैं। जंगल में संतुलन बनाए रखने में बाघों का बहुत बड़ा योगदान है। तृणभोजी जीव (हिरन, चीतल, सांभर, अंपाला, नीलगाय आदि) बाघों के प्राकृतिक आहार हैं। तृणभोजियों की संख्या बढ़ने पर जंगल की हरियाली को क्षति पहुंचती है। ऐसे में प्रकृति प्रदत्त स्वभाव के कारण बाघ तृणभोजियों का शिकार करता है। इसके साथ ही जहां बाघ रहते हैं वहां उनकी दहशत के कारण इंसानी दखल भी सामान्यत: कम होता है। इसतरह से जंगल का संतुलन बनाए रखने में बाघ महत्वपूर्ण साबित होता है। हालांकि इनदिनों जंगल में इंसानों की घुसपैठ बढ़ने से बाघ ज्यादा आक्रामक हो रहे हैं।
तेजी, ताकत और चपलता बाघ को बनाती है विशेष
आकार-प्रकार : बाघ की औसत उम्र 20 से 30 वर्ष होती है। ये अपना इलाका बनाकर अकेले रहना पसंद करते हैं। अपने इलाके की सीमाओं पर मूत्र कर निशान लगाते हैं। करीब साढ़े तीन महीने के गर्भकाल के बाद बाघिन दो से तीन शावक को जन्म देती है। बाघ की 8 प्रजातियो में से अब सिर्फ 6 ही बची हैं। बड़े आकार, ताकत के साथ ही काली धारियों से पहचाना जा सकता है। बाघ की सुनने, सूंघने और देखने की क्षमता तेज होती है। करीब 19 वर्ष बाघ की आयु होती है।
आवास : बाघ को वन, दलदली क्षेत्र व घास के मैदानों के पास रहना पसंद है। अंधेरे में साफ शिकार देखने की क्षमता के कारण इसे बाघ को रात में शिकार पसंद है।
आहार : देखने में सुंदर इस खतरनाक जानवार को हिरण, गाय, भैंस, बकरी, चीतल पसंद हैं। एक बार में 25 किलो मांस खा सकता है। अब जंगल के अंदर तक फैलती इनसानी बस्तियों के कारण पालतू पशुओं को भी निशाना बना रहा है।
हमले का तरीका: बाघा झाड़ियों व ऊंची घास के बीच अच्छी तरह छिप जाता है। ज्यादातर बार शिकार उसे देख नहीं पाता। बाघ अक्सर पीछे से हमला करता है। दबेपांव छिपकर शिकार के नजदीक तक पहुंच अचानक से कूद पड़ता है। इसे तैरने में भी महारत हासिल है।
कमजोरी : बाघ का शरीर भारी होता है ऐसे में वह शिकार का पीछा करते समय जल्द थक जाता है। इसलिए वह लंबी दूरी तक नहीं दौड़ पता और मजबूरन शिकार छोड़ देता है। विशेषज्ञों के अनुसार हर 20 प्रयासों में वह एक बार ही सफल हो पाता है।
बाघों के शिकार का कारण
बाघ के अंगों का दवाओं और लक्जरी उत्पादों में प्रयोग हो रहा है। इनकी मांग बहुत ज्यादा होने से अंधाधुंध शिकार किया जा रहा है, जिससे इनके विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है।
दांत : करीब तीन इंच तक लंबे चार दांत मांस को चीरने का काम करते हैं। कुछ छोटे दांत भी होते हैं। आभूषण व ताबीज के रूप में प्रयोग होते हैं। वहीं हड्डियों से शक्तिवर्धक दवाएं बनाए जाते हैं।
नाखून : करीब तीन इंच तक के नाखून पैर में एक खास आवरण से ढंके होते हैं। शिकार दबोचने के समय ये नाखून खंजर की तरह बाहर निकल आते हैं। नाखून जेवर और ताबीज के रूप में प्रयोग।
खाल : बाघ की खाल भूरे रंग और काली पट्टियों के कारण बहुत पसंद किया जाता है। बाघ के खाल से कपड़ा, कालीन और सजावटी सामान बनाए जाते हैं।
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| साभार : इंटरनेट |
बाघ संरक्षण के लिए बनाए गए रिजर्व
लगातार होते शिकार ने बाघों को विलुप्त होने की कगार पर ला दिया है। भारत में बाघों के सरंक्षण के लिए सरकार ने पहल करते हुए वर्ष 1973 में बाघ अभ्यारण की स्थापना की। शुरुआत में 9 टाइगर रिजर्व बनाए गए जो अब 50 हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश में दुधवा टाइगर रिजर्व और पीलीभीत टाइगर रिजर्व बनाए गए। पीलीभीत टाइगर रिजर्व 73000 हेक्टेयर में फैला है। साल का विशाल घना सुंदर जंगल वन्य जीवन से भरपूर इस जंगल के अंदर से कई नदियां व नहरें गुजरती हैं। बाघ संरक्षण के नाम पर जंगल नौ जून 2014 को टाइगर रिजर्व का दर्जा दिया गया। वहीं प्रदेश का इकलौता नेशनल पार्क दुधवा 1324 वर्ग किलोमीटर एरिया में फैला है। बफर जोन और यहां के जंगल बाघों के लिए मुफीद हैं। यह किशनपुर सेंचुरी में इस सत्र में सबसे ज्यादा बाघ दिखे पर बाघ जंगल में हों तो बेहतर है, अब वे गांवों के करीब भी दिख रहे हैं।
आधुनिक तकनीकों और संसाधनों को अपना कर बचा सकते हैं बाघों की जान
सेंटर फार वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन एंड डिजीज सर्विलेंस के प्रधान वैज्ञानकि डॉ. अभिजीत पावड़े का कहना है कि लखीमपुर के दुधवा टाइगर रिजर्व और पीलीभीत टाइगर रिजर्व का पूरा इलाका बाघों और अन्य वन्यजीवों के लिए मुफीद है। दोनों जगह की आबोहवा जंगली जानवरों के अनुकूल होने से उनके रहने के लिए अच्छा माहौल है। इसके कारण वन्य जीवों की संख्या में इजाफा हो रहा है लेकिन इनसब के साथ ही इन जानवरों की सुरक्षा और आहार का संकट भी खड़ा हो रहा है। टाइगर रिजर्व में मौजूद संसाधन वर्तमान के अनुकूल नहीं हैं। यहां पर बाघों पर नजर रखने के लिए न तो पर्याप्त मचान हैं न ही जीपीएस तकनीक बेहतर है। इसके अलावा रिमोट सेंसिंग तकनीक भी नहीं है जिससे बाघ की लोकेशन को ट्रेस करना आसान हो। ऐसे में वन्य जीवों के सरंक्षण के लिए हमें इन संसाधनों को बढ़ाने के साथ ही आधुनिक तकनीकों का भी उपयोग करना पड़ेगा। यदि इसको लेकर कदम नहीं उठाए गए तो बाघों के साथ ही अन्य जीवों के संरक्षण में भी दिक्कतें आएंगी।
इन बेरहम तरीकों से बाघों का हो रहा शिकार
बाघों के शिकार के लिए शिकारी बेहद कू्रर तरीकों का प्रयोग करते हैं। बाघों के आनेजाने के रास्ते पर लोहे के मजबूत फंदे लगाकर छोड़ दिया जाता है। जब बाघ उधर से गुजरता है तो उनका पैर लोहे के ट्रैप में फंस जाता है। नजीता बाघ तड़प-तड़प कर खुद मर जाता है या शिकारी आसानी से मार देते हैं। इसके अलावा लोहे के तार का ट्रैप भी बांध दिया जाता है। कई स्थानों पर गड्ढे बनाकर उसके ऊपर बांस की फट्टी लगाकर उसे पत्तियों से ढ़क दिया जाता है। बाघ को वह गड्ढा आम रास्ता समझ में आता है। उधर से गुजरने के दौरान वह गड्ढे में गिर जाता है। बाद में शिकारी आसानी से उन्हें मार डालते हैं। वहीं आजकल पेस्टीसाइड के प्रयोग से भी बाघ को मौत की नींद सुलाया जा रहा है। पालतू पशुओं के शरीर में घाव कर उसमें जानलेवा पेस्टीसाइड डालकर उसे जंगल में छोड़ दिया जा रहा है। नतीजा बाघ, तेंदुए या अन्य जंगली जानवर इन पशुओं का शिकार कर लेते हैं। कुछ ही दिन में पेस्टीसाइड के कारण उनकी मौत हो जाती है।


जानकारी परक लेख
ReplyDeleteशुक्रिया।
Deleteबहुत ज्ञानवर्धक जानकारी।👌
ReplyDeleteधन्यवाद।
DeleteVery nice
ReplyDeleteधन्यवाद।
Deleteजबरदस्त
ReplyDeleteधन्यवाद।
Deleteअच्छी जानकारी
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