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शर्मीली बाघिन जिसने बरेली की बंद फैक्ट्री पर किया राज

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  🐾  अनुराग शुक्ला    नेपाल से सटे तराई क्षेत्र के लखीमपुर खीरी और पीलीभीत के जंगल जैवविधता से संपन्न हैं। खीरी का दुधवा नेशनल पार्क और पीलीभीत टाइगर रिजर्व बाघों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। हम यहां बात करेंगे एक ऐसी बाघिन जिसने इन जंगलों से बहुत दूर बरेली की एक बंद पड़ी फैक्ट्री को अपना ठिकाना बनाया। अपने मूल आक्रामक स्वभाव के विपरीत शांत होने के कारण बाघिन को 'शर्मीली' नाम मिला। इस बाघिन ने फैक्ट्री पर सालभर से अधिक समय तक राज किया। बरेली शहर से करीब 27 किलोमीटर दूर फतेहगंज पश्चिमी में  रबर फैक्ट्री है। करीब 22 वर्षों से बंद पड़ी फैक्ट्री का 1270 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैला विशाल परिसर अब जंगल का रूप ले चुका है। यह स्थान शांत वातावरण, घास की उपलब्धता और छिपने के लिए बड़ी-बड़ी झाड़ियों के कारण हिरनों, चीतालों और जंगली सुअरों का पसंदीदा जगह बन गया। इसी फैक्ट्री में 13 मार्च 2020 को एक बाघिन के दिखने से आसपास के गांवों में दहशत फैल गई। यहां बाघिन की मौजूदगी ने मीडिया में सुर्खिंया बटोरी। शहर के इतने पास किसी विडालवंशी के होने मात्र की कल्पना से वन्यज...

वेटलैंड डे : तेजी से सिकुड़ रही धरती की ‘किडनी’

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अनुराग शुक्ला हमारी जीवनदायिनी भूमि की किडनी तेजी से सिकुड़ रही है। हम बात कर रहे हैं वेटलैंड (आर्द्रभूमि) की जिसे ‘किडनीज ऑफ द लैंडस्केप’ भी कहा जाता है। दो फरवरी को वेटलैंड डे मनाया जाता है। बढ़ते शहरीकरण और कब्जों के कारण जैवविविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण वेटलैंड को खत्म कर रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार वर्ष 1900 के बाद से अब तक 85 प्रतिशत से अधिक वेटलैंड खत्म हो चुके हैं। आइए जानते हैं क्या है वेटलैंड, कैसे हो रहे खत्म, क्यों है इनकी जरूरत और कैसे वेटलैंड को बचाया जा सकता है। पर्यावरणविद व रांची यूनिवर्सिटी में भूविज्ञान के सहायक प्रोफेसर नीतीश प्रियदर्शी के अनुसार देश में रामसर समझौते के तहत 42 वेटलैंड संरक्षित किए जा रहे हैं। जिनका क्षेत्रफल करीब 1,081,438 हेक्टेयर है। हालांकि इसके अलावा भी हजारों वेटलैंड्स हैं जो जैविक और आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण तो हैं पर उनकी कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं है।   क्या है वेटलैंड नमी या दलदली भूमि वाले क्षेत्र वेटलैंड (आर्द्रभूमि) कहे जाते हैं। यहां पूरे वर्ष आंशिक या पूर्ण रूप से पानी भरा रहता है। आर्द्रभूमि जल को प्रदूषण से मुक्त बनाती ...

पर्यावरण प्रहरी : पेड़ बचाने को घर का नक्शा बदल डाला

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🌳 अनुराग शुक्ला हमारी पृथ्वी तभी सुरक्षित रह सकती है जब पर्यावरण का संरक्षण होगा। अंधाधुंध पेड़ों की कटाई और बढ़ते प्रदूषण ने न सिर्फ जीव-जंतुओं बल्कि संपूर्ण मानव जाति को प्रभावित किया है। ऐसे में कुछ लोग हैं जो पर्यावरण को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। बरेली के  पर्यावरण रक्षकों ने भवन निर्माण में आड़े आ रहे पेड़ों को नक्शे में बदलाव कर न सिर्फ बचाया बल्कि उन्हें बढ़ने का मौका भी दिया।  फोटो : रोहित उमराव आम के पेड़ को न सिर्फ बचाया उसे खूबसूरत रूप भी दिया बरेली में राजेंद्रनगर में कैलाश हॉस्पिटल में भी एक आम का पड़े है। हॉस्पिटल के मालिक डॉ. मनीष टंडन कहते हैं बताया कि हॉस्पिटल के लिए जब जमीन ली गई तो वहां छोटा सा आम का पेड़ भी था। पत्नी बरेली कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रूपाली टंडन ने कहा कि किसी कीमत पर पेड़ नहीं कटेगा। फिर पेड़ को बचाते हुए दीवार बनाई गई। बाहर से पेड़ को शीशे से कवर कर दिया गया। इससे पेड़ के बचने के साथ ही खूबसूरती भी बढ़ गई। डॉ. रूपाली ने कहा कि पर्यावरण को बचाना सभी का कर्तव्य है। आज ये पेड़  पेड़ को देखकर काफी खुशी होती है।...

जंगल में मानव दखल से बाघ बेचैन

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🐾 अनुराग शुक्ला अपनी प्रजाति का सबसे ताकतवर जीव बाघ संकटग्रस्त है। अंधाधुंध शिकार और मानवों से संघर्ष के कारण इसपर खतरा बढ़ा है। आइए जानते हैं कि क्यों बाघों के सरंक्षण की जरूरत है।    फोटो : बिलाल रजा, पीलीभीत पूरी दुनिया में अनुमानित 3,900 बाघ जंगल में रहते हैं। इनमें से सार्वाधिक अपने देश में हैं। वर्ष 2018-19 की गणना के आधार पर भारत में करीब तीन हजार (2967) बाघ हैं। 526 बाघों के साथ मध्यप्रदेश देश का सार्वाधिक बाघों वाला प्रदेश है। वहीं दूसरे नंबर पर रहे कर्नाटक में 524 और तीसरे नंबर पर रहे उत्तराखंड में 442 बाघ हैं। उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां लखीमपुर खीरी टाइगर रिजर्व में 100 से ज्यादा, जबकि पीलीभीत टाइगर रिजर्व में 65 से अधिक बाघ हैं। भारतीय जंगलों में अनुकूल पर्यावरण मिलने पर बाघों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन इसके साथ ही जंगल में मानवों के बढ़ते दखल ने बाघों को बेचैन कर दिया है। विशेषज्ञों की मानें तो तमाम उपायों के बाद भी शिकारियों और ग्रामीणों की पहुंच जंगल के कोर जोन तक हो जाने से इन वन्य जीवों के रहन-सहन में खलल पड़ रहा है। इसके अलावा जंगल से सटे इलाकों...

हम करेंगे प्रकृति का सम्मान तभी होगा कल्याण

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🌳 अनुराग शुक्ला पृथ्वी जैव विविधताओं की बदौलत जीवन को जीवंत बनाए हुए हैं। जंगल, वन्यजीव, कीट, खाद्यान्न, नदियां, समुद्र हमारे अस्तित्व एवं विकास के लिए आवश्यक हैं। इसी जैव संपदा के संरक्षण और संवर्धन के लिए दुनिया हर वर्ष 22 मई को विश्व जैव विविधता दिवस मनाती है। इस वर्ष का विषय रहा ‘प्रकृति में ही हमारा समाधान है’। हम प्रकृति का सम्मान करेंगे तभी हमारा अस्तित्व भी बच सकेगा। हमारी पृथ्वी जितनी खूबसूरत है उससे कहीं ज्यादा रहस्यमयी है। आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि अभी भी मानव पृथ्वी के अनगिनत रहस्यों तक नहीं पहुंच सका है। ये चौकाने वाला तथ्य इसलिए भी है कि हमारी उड़ान अंतरिक्ष तक है। हम न सिर्फ चांद से लेकर मंगल तक की दूरी नाप रहे हैं बल्कि वहां की जमीन तक पहुंच बनाने में सफल रहे हैं। आने वाले समय में कई अन्य ग्रहों तक हमारी पहुंच हो जाएगी। वहीं विशेषज्ञों की माने तो इनसान अभी तक धरती के पूरे भूभाग तक नहीं पहुंच पाया है। 80 प्रतिशत जैव विविधता जंगलों में रहती है अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) के अनुसार पृथ्वी करीब आठ मिलियन प्रजातियों का घर है। इनमें से 80% जै...

ज से जंगल

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🌿 अनुराग शुक्ला ज से जंग ही नहीं ज से जंगल भी होता है। जंगल किसी जंग के मैदान से कम थोड़ी न है। अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद में यहां भी निरंतर जंग चलती है... अपने से, अपनों से... बाहर से हरा भरा और घना, अंदर पोर पोर से रिसता दर्द। आपने जंगल की सिसकियां सुनी हैं। नहीं सुनी होंगी। कोई बात नहीं। कभी जंगल जाइएगा तो कान लगाइएगा। चारों तरफ पसरी शांति के बीच पक्षियों की चहचहाहट के साथ आपको धीमे से एक सिसकी सुनाई देगी। जरा नजर दौड़ाएंगे तो पेड़ों के ठूंठ भी सिसकते दिखेंगे। ये जंगल की सिसकी उसके अपने लिए नहीं है अपनों के लिए है। उन अपनों के लिए जिन्हें जीवंत रखने की उसपर जिम्मेदारी है। सबको जीवन देने के फलसफे को जीते जंगल का अपना जीवन ही संकट में है। कभी सोचा है कि जब जंगल खत्म हो जाएंगे तो क्या होगा? ज्यादातर जगहों से जंगल नष्ट हो रहे हैं तो वहां क्या हो रहा है? इंसान के लालच का कैसा प्रभाव पड़ रहा? इससे हमपर भी कोई संकट आएगा? इन सवालों का जवाब हमें ही ढूंढना है। यूं कहें कि ढूंढना ही पड़ेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि हम भी जंगल के अपनों में हैं... याद है न जंगल की सिसकी... आंकड़ों की बा...