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अन्नदाता ! नन्ही मधुमक्खी

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 - अनुराग शुक्ला हमारी खूबसूरत पृथ्वी असंख्य जीवों का घर है। इसका अस्तित्व बचाए रखने में तितलियों, पतंगों, भृंग, मधुमखियों, ततैया सहित 29 प्रमुख कीट समूहों की बेहद महत्वपूर्ण भूमिका है। ये नन्हे जीव धरती की जैवविविधता को तो समृद्ध करते ही हैं, दुनिया की 87 प्रमुख खाद्य फसलों से मिलने वाले फल, सब्जियां और बीज के परागण की जिम्मेदारी भी निभाते हैं। आज बात करेंगे इन्हीं कीटों में से एक मधुमक्खी की।  धरती पर मधुमक्खियों की 20 हजार से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। ये 2 मिलीमीटर से लेकर 4 सेंटीमीटर तक के आकार में होती हैं। फूल-पौधे और मधुमक्खियों के बीच महत्वपूर्ण संबंध है। ये सिलसिला करीब 10 करोड़ वर्ष से चल रहा है। ऐसे में दोनों के बीच सामंजस्य और परस्पर निर्भरता पृथ्वी को लगातार समृद्ध कर रही है। दरअसल हम जितने भी प्रकार की खाद्य फसलें प्रयोग करते हैं उनमें से करीब 75% बीज और फल होते हैं। प्रमुख खाद्य फसलों का उत्पादन पूर्ण या आंशिक रूप से परागण पर ही निर्भर है। परागण की इस प्रक्रिया में मधुमक्खियों का योगदान अग्रणी है।  फूल पर बैठी मधुमक्खी सिर्फ शहद के लिए रस ही नहीं जुटाती...

शहरों की चकाचौंध प्रवासी पक्षियों के लिए खतरनाक

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अनुराग शुक्ला आजकल शहर से लेकर कस्बे तक तेज रोशनी से चकाचौंध हो रहे हैं लेकिन प्रवासी पक्षियों पर इस प्रकाश प्रदूषण की मार पड़ रही है। सैकड़ों-हजारों किलोमीटर की यात्रा के दौरान तेज रोशनी से ये खूबसूरत #पक्षी अपना रास्ता भटक रहे हैं। ऐसे में रात में अनावश्यक लाइट के प्रयोग से बचने का हमारा साझा प्रयास इन पक्षियों को सुरक्षित उड़ने भरने में मदद करेगा। हमारे आसपास दिखने वाले पक्षियों के साथ ही कुछ ऐसे भी हैं जो भोजन, कठोर मौसम से सुरक्षा, प्रजनन, अंडे देने, चूजों की देखभाल को सैकड़ों-हजारों किमी की दूरी तय कर विभिन्न स्थानों पर आते-जाते हैं। ये पक्षी झीलों, तालाबों, आर्द्रभूमि (वेटलैंड) आदि स्थानों पर रुकते हैं। लेकिन शिकार, खत्म होते पर्यावास, नष्ट होते पानी के स्रोत और पृथ्वी की सतह पर बढ़ती रोशनी के कारण इन पक्षियों का आना लगातार कम होता जा रहा है। ऐसे में इनकी सुरक्षा और जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रत्येक वर्ष मई और अक्तूबर माह का दूसरा शनिवार विश्व प्रवासी पक्षी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष इस विशेष दिवस की थीम है ‘प्रवासी पक्षियों पर प्रकाश प्रदूषण का प्रभाव’ और नारा है ‘रात...

हैप्पी बर्थडे #फोटाउ

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- अनुराग शुक्ला आइए मिलते हैं दुनिया की सबसे बूढ़ी #गोरिल्ला फोटाउ से। आप इसे किंग कांग और टारजन जैसी फिल्मों वाला गोरिल्ला न समझें। ये तो बेहद शान्त स्वभाव का शानदार जीव है। फिल्मों ने इनकी छवि खूंखार और खतरनाक जानवर की बना दी है लेकिन यह तभी आक्रामक होता है जब इसके परिवार पर कोई खतरा होता है। फोटो इंटरनेट से साभार बात फटोउ की। बर्लिन के चिड़याघर में रहने वाली फोटाउ ने 13 अप्रैल को अपना 65वां जन्मदिन मनाया। आप सोच रहे होंगे कि इसमें कौन सी विशेष बात है। दरअसल गोरिल्ला की औसत आयु 40 वर्ष मानी जाती है लेकिन फोटाउ पूरी दुनिया में अकेली गोरिल्ला है जो 65 वर्ष की है। फोटो इंटरनेट से साभार बर्लिन चिड़याघर के क्रिस्टिया...

शर्मीली बाघिन जिसने बरेली की बंद फैक्ट्री पर किया राज

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  🐾  अनुराग शुक्ला    नेपाल से सटे तराई क्षेत्र के लखीमपुर खीरी और पीलीभीत के जंगल जैवविधता से संपन्न हैं। खीरी का दुधवा नेशनल पार्क और पीलीभीत टाइगर रिजर्व बाघों के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। हम यहां बात करेंगे एक ऐसी बाघिन जिसने इन जंगलों से बहुत दूर बरेली की एक बंद पड़ी फैक्ट्री को अपना ठिकाना बनाया। अपने मूल आक्रामक स्वभाव के विपरीत शांत होने के कारण बाघिन को 'शर्मीली' नाम मिला। इस बाघिन ने फैक्ट्री पर सालभर से अधिक समय तक राज किया। बरेली शहर से करीब 27 किलोमीटर दूर फतेहगंज पश्चिमी में  रबर फैक्ट्री है। करीब 22 वर्षों से बंद पड़ी फैक्ट्री का 1270 एकड़ से ज्यादा क्षेत्र में फैला विशाल परिसर अब जंगल का रूप ले चुका है। यह स्थान शांत वातावरण, घास की उपलब्धता और छिपने के लिए बड़ी-बड़ी झाड़ियों के कारण हिरनों, चीतालों और जंगली सुअरों का पसंदीदा जगह बन गया। इसी फैक्ट्री में 13 मार्च 2020 को एक बाघिन के दिखने से आसपास के गांवों में दहशत फैल गई। यहां बाघिन की मौजूदगी ने मीडिया में सुर्खिंया बटोरी। शहर के इतने पास किसी विडालवंशी के होने मात्र की कल्पना से वन्यज...

वेटलैंड डे : तेजी से सिकुड़ रही धरती की ‘किडनी’

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अनुराग शुक्ला हमारी जीवनदायिनी भूमि की किडनी तेजी से सिकुड़ रही है। हम बात कर रहे हैं वेटलैंड (आर्द्रभूमि) की जिसे ‘किडनीज ऑफ द लैंडस्केप’ भी कहा जाता है। दो फरवरी को वेटलैंड डे मनाया जाता है। बढ़ते शहरीकरण और कब्जों के कारण जैवविविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण वेटलैंड को खत्म कर रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार वर्ष 1900 के बाद से अब तक 85 प्रतिशत से अधिक वेटलैंड खत्म हो चुके हैं। आइए जानते हैं क्या है वेटलैंड, कैसे हो रहे खत्म, क्यों है इनकी जरूरत और कैसे वेटलैंड को बचाया जा सकता है। पर्यावरणविद व रांची यूनिवर्सिटी में भूविज्ञान के सहायक प्रोफेसर नीतीश प्रियदर्शी के अनुसार देश में रामसर समझौते के तहत 42 वेटलैंड संरक्षित किए जा रहे हैं। जिनका क्षेत्रफल करीब 1,081,438 हेक्टेयर है। हालांकि इसके अलावा भी हजारों वेटलैंड्स हैं जो जैविक और आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण तो हैं पर उनकी कानूनी स्थिति स्पष्ट नहीं है।   क्या है वेटलैंड नमी या दलदली भूमि वाले क्षेत्र वेटलैंड (आर्द्रभूमि) कहे जाते हैं। यहां पूरे वर्ष आंशिक या पूर्ण रूप से पानी भरा रहता है। आर्द्रभूमि जल को प्रदूषण से मुक्त बनाती ...

पर्यावरण प्रहरी : पेड़ बचाने को घर का नक्शा बदल डाला

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🌳 अनुराग शुक्ला हमारी पृथ्वी तभी सुरक्षित रह सकती है जब पर्यावरण का संरक्षण होगा। अंधाधुंध पेड़ों की कटाई और बढ़ते प्रदूषण ने न सिर्फ जीव-जंतुओं बल्कि संपूर्ण मानव जाति को प्रभावित किया है। ऐसे में कुछ लोग हैं जो पर्यावरण को बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। बरेली के  पर्यावरण रक्षकों ने भवन निर्माण में आड़े आ रहे पेड़ों को नक्शे में बदलाव कर न सिर्फ बचाया बल्कि उन्हें बढ़ने का मौका भी दिया।  फोटो : रोहित उमराव आम के पेड़ को न सिर्फ बचाया उसे खूबसूरत रूप भी दिया बरेली में राजेंद्रनगर में कैलाश हॉस्पिटल में भी एक आम का पड़े है। हॉस्पिटल के मालिक डॉ. मनीष टंडन कहते हैं बताया कि हॉस्पिटल के लिए जब जमीन ली गई तो वहां छोटा सा आम का पेड़ भी था। पत्नी बरेली कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रूपाली टंडन ने कहा कि किसी कीमत पर पेड़ नहीं कटेगा। फिर पेड़ को बचाते हुए दीवार बनाई गई। बाहर से पेड़ को शीशे से कवर कर दिया गया। इससे पेड़ के बचने के साथ ही खूबसूरती भी बढ़ गई। डॉ. रूपाली ने कहा कि पर्यावरण को बचाना सभी का कर्तव्य है। आज ये पेड़  पेड़ को देखकर काफी खुशी होती है।...

जंगल में मानव दखल से बाघ बेचैन

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🐾 अनुराग शुक्ला अपनी प्रजाति का सबसे ताकतवर जीव बाघ संकटग्रस्त है। अंधाधुंध शिकार और मानवों से संघर्ष के कारण इसपर खतरा बढ़ा है। आइए जानते हैं कि क्यों बाघों के सरंक्षण की जरूरत है।    फोटो : बिलाल रजा, पीलीभीत पूरी दुनिया में अनुमानित 3,900 बाघ जंगल में रहते हैं। इनमें से सार्वाधिक अपने देश में हैं। वर्ष 2018-19 की गणना के आधार पर भारत में करीब तीन हजार (2967) बाघ हैं। 526 बाघों के साथ मध्यप्रदेश देश का सार्वाधिक बाघों वाला प्रदेश है। वहीं दूसरे नंबर पर रहे कर्नाटक में 524 और तीसरे नंबर पर रहे उत्तराखंड में 442 बाघ हैं। उत्तर प्रदेश की बात करें तो यहां लखीमपुर खीरी टाइगर रिजर्व में 100 से ज्यादा, जबकि पीलीभीत टाइगर रिजर्व में 65 से अधिक बाघ हैं। भारतीय जंगलों में अनुकूल पर्यावरण मिलने पर बाघों की संख्या बढ़ रही है। लेकिन इसके साथ ही जंगल में मानवों के बढ़ते दखल ने बाघों को बेचैन कर दिया है। विशेषज्ञों की मानें तो तमाम उपायों के बाद भी शिकारियों और ग्रामीणों की पहुंच जंगल के कोर जोन तक हो जाने से इन वन्य जीवों के रहन-सहन में खलल पड़ रहा है। इसके अलावा जंगल से सटे इलाकों...